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अनुशासन पर्व
अध्याय २३
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युधिष्ठिर उवाच
यदिदं व्राह्मणा लोके व्रतिनो भुञ्जते हविः |  १६   क
भुक्तं व्राह्मणकामाय़ कथं तत्सुकृतं भवेत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति