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अनुशासन पर्व
अध्याय २३
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युधिष्ठिर उवाच
अनेकान्तं वहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिणः |  १८   क
किं निश्चितं भवेत्तत्र तन्मे व्रूहि पितामह ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति