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अनुशासन पर्व
अध्याय १७
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उपमन्युरु उवाच
भक्तिमेव पुरस्कृत्य मय़ा यज्ञपतिर्वसुः |  १५२   क
ततोऽभ्यनुज्ञां प्राप्यैव स्तुतो मतिमतां वरः ||  १५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति