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अनुशासन पर्व
अध्याय २६
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अङ्गिरा उवाच
सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च इन्द्रमार्गे च तर्पय़न् |  १५   क
सुधां वै लभते भोक्तुं यो नरो जाय़ते पुनः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति