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सभा पर्व
अध्याय २३
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अर्जुन उवाच
भवान्पितृसखा चैव प्रीय़माणो मय़ापि च |  २५   क
ततो नाज्ञापय़ामि त्वां प्रीतिपूर्वं प्रदीय़ताम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति