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सभा पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
ये त्वां दासमराजानं वाल्यादर्चन्ति दुर्मतिम् |  ४   क
अनर्हमर्हवत्कृष्ण वध्यास्त इति मे मतिः |  ४   ख
इत्युक्त्वा राजशार्दूलस्तस्थौ गर्जन्नमर्षणः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति