वन पर्व  अध्याय २३

वासुदेव उवाच

सोऽहं पर्वतवर्षेण वध्यमानः समन्ततः |  ११   क
वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितोऽभवम् ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति