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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
ध्रुवं वै व्राह्मणे सत्यं ध्रुवा साधुषु संनतिः |  ५४   क
श्रीर्ध्रुवा चापि दक्षेषु ध्रुवो नाराय़णे जय़ः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति