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वन पर्व
अध्याय २३
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वासुदेव उवाच
ततः पर्वतभारार्ता मन्दप्राणविचेष्टिताः |  १८   क
हय़ा मम महाराज वेपमाना इवाभवन् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति