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सभा पर्व
अध्याय ७१
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् |  ४६   क
सम्यगाह गुरुः क्षत्तरुपावर्तय़ पाण्डवान् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति