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वन पर्व
अध्याय १२७
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लोमश उवाच
कदाचित्तस्य वृद्धस्य यतमानस्य यत्नतः |  ४   क
जन्तुर्नाम सुतस्तस्मिन्स्त्रीशते समजाय़त ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति