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वन पर्व
अध्याय २३
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वासुदेव उवाच
जहि सौभं स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम |  ३१   क
इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति