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वन पर्व
अध्याय २३
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वासुदेव उवाच
ततोऽहं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपतः |  ३८   क
शङ्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृदः पर्यहर्षय़म् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति