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वन पर्व
अध्याय २३
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वैशम्पाय़न उवाच
धृष्टकेतुः स्वसारं च समादाय़ाथ चेदिराट् |  ४७   क
जगाम पाण्डवान्दृष्ट्वा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति