वन पर्व  अध्याय २३

वैशम्पाय़न उवाच

समवाय़ः स राजेन्द्र सुमहाद्भुतदर्शनः |  ५०   क
आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ ||  ५०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति