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विराट पर्व
अध्याय २३
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वृहन्नडो उवाच
कथं सैरन्ध्रि मुक्तासि कथं पापाश्च ते हताः |  २०   क
इच्छामि वै तव श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति