विराट पर्व  अध्याय २३

सैरन्ध्र्यु उवाच

न हि दुःखं समाप्नोषि सैरन्ध्री यदुपाश्नुते |  २२   क
तेन मां दुःखितामेवं पृच्छसे प्रहसन्निव ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति