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विराट पर्व
अध्याय २३
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वैशम्पाय़न उवाच
सैरन्ध्री च विमुक्तासौ पुनराय़ाति ते गृहम् |  ३   क
सर्वं संशय़ितं राजन्नगरं ते भविष्यति ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति