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कर्ण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
सोऽहं ज्ञात्वा रणे तस्य कर्म दृष्ट्वा च फल्गुन |  १६   क
व्यवसीदामि दुःखेन न च मे जीवितं प्रिय़म् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति