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विराट पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
स हस्तिनेवाभिहतो गजेन्द्रः; प्रगृह्य भल्लान्निशितान्निषङ्गात् |  २१   क
आकर्णपूर्णं च धनुर्विकृष्य; विव्याध वाणैरथ सूतपुत्रम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति