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भीष्म पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते |  ३०   क
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति