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भीष्म पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
अहो वत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वय़म् |  ४५   क
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति