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भीष्म पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् |  ४७   क
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति