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द्रोण पर्व
अध्याय २३
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धृतराष्ट्र उवाच
यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः |  १४   क
सोऽस्माच्च हीय़ते लोकात्क्षुद्रभावं च गच्छति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति