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द्रोण पर्व
अध्याय २३
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धृतराष्ट्र उवाच
अद्य चाप्यस्य राष्ट्रस्य हतोत्साहस्य सञ्जय़ |  १५   क
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति