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द्रोण पर्व
अध्याय २३
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धृतराष्ट्र उवाच
व्यक्तमेव च मे शंस यथा युद्धमवर्तत |  १७   क
केऽय़ुध्यन्के व्यपाकर्षन्के क्षुद्राः प्राद्रवन्भय़ात् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति