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वन पर्व
अध्याय २४९
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कोटिकाश्य उवाच
यं षट्सहस्रा रथिनोऽनुय़ान्ति; नागा हय़ाश्चैव पदातिनश्च |  ११   क
जय़द्रथो नाम यदि श्रुतस्ते; सौवीरराजः सुभगे स एषः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति