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वन पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं गते विदुर यदद्य कार्यं; पौराश्चेमे कथमस्मान्भजेरन् |  ३   क
ते चाप्यस्मान्नोद्धरेय़ुः समूला; न्न कामय़े तांश्च विनश्यमानान् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति