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वन पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीन्महाप्राज्ञं धृतराष्ट्रः प्रतापवान् |  १८   क
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति