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वन पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति राजा मय़ा कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि |  ३४   क
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा भवेत् |  ३४   ख
न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीति मे मतिः ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति