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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा तु शरं घोरं देवगन्धर्वमानवाः |  १२   क
स्वस्त्यस्तु समरे राजन्द्रोणाय़ेत्यव्रुवन्वचः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति