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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
व्रह्मक्षत्रस्य विहिताः सूता वै परिचारकाः |  ३६   क
न विट्शूद्रस्य तत्रैव शृणु वाक्यं ममानघ ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति