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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
तस्मात्पार्थविनाशार्थं हितार्थं मम चैव हि |  ४   क
सारथ्यं रथिनां श्रेष्ठ सुमनाः कर्तुमर्हसि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति