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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
प्रणय़ाद्वहुमानाच्च तं निगृह्य सुतस्तव |  ४१   क
अव्रवीन्मधुरं वाक्यं साम सर्वार्थसाधकम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति