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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
न च त्वत्तो हि राधेय़ो न चाहमपि वीर्यवान् |  ४७   क
वृणीमस्त्वां हय़ाग्र्याणां यन्तारमिति संय़ुगे ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति