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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
अस्याभीशुग्रहो लोके नान्योऽस्ति भवता समः |  ५   क
स पातु सर्वतः कर्णं भवान्व्रह्मेव शङ्करम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति