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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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शल्य उवाच
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेय़स्य यशस्विनः |  ५२   क
युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति