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कर्ण पर्व
अध्याय २३
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शल्य उवाच
समय़श्च हि मे वीर कश्चिद्वैकर्तनं प्रति |  ५३   क
उत्सृजेय़ं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य संनिधौ ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति