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वन पर्व
अध्याय १७५
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जनमेजय़ उवाच
तं शंससि भय़ाविष्टमापन्नमरिकर्षणम् |  ३   क
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति