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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
गोग्रहे यत्र पार्थेन निर्जिताः कुरवो युधि |  १३२   क
गोधनं च विराटस्य मोक्षितं यत्र पाण्डवैः ||  १३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति