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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
ततो ज्यातलनिर्घोषः पुनरासीद्विशां पते |  १३   क
प्रादुरासीच्छराणां च सुमुक्तानां सुदारुणः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति