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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
समुद्रकल्पं तु वलं धार्तराष्ट्रस्य माधव |  १८   क
अस्मानासाद्य सञ्जातं गोष्पदोपममच्युत ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति