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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्ता तेन वैदेही परिवृत्य शुभानना |  १७   क
तृणमन्तरतः कृत्वा तमुवाच निशाचरम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति