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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनो महाराज कश्मलेनाभिसंवृतः |  १८   क
अपय़ाने मनश्चक्रे विहीनवलवाहनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति