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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
स युध्यमानः पृतनामुखस्था; ञ्शूराञ्शूरो हर्षय़न्सव्यसाची |  ५६   क
पूर्वापदानैः प्रथितैः प्रशंस; न्स्थिरांश्चकारात्मरथाननीके ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति