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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
यन्न तस्य मनो ह्यासीत्त्वय़ोक्तस्य हितं वचः |  ३३   क
प्रशमे पाण्डवैः सार्धं सोऽन्यस्य शृणुय़ात्कथम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति