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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
यावत्प्राणा धमिष्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य मानद |  ३८   क
तावद्युष्मास्वपापेषु प्रचरिष्यति पातकम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति