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शल्य पर्व
अध्याय ३
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सञ्जय़ उवाच
इन्द्रकार्मुकवज्राभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम् |  १८   क
वानरं केतुमासाद्य सञ्चचाल महाचमूः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति