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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
यत्रैतत्सुमहच्छत्रं पूर्णचन्द्रसमप्रभम् |  ४   क
यत्रैते सतलत्राणा रथास्तिष्ठन्ति दंशिताः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति