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वन पर्व
अध्याय १३१
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राजो उवाच
प्रस्पन्दमानः सम्भ्रान्तः कपोतः श्येन लक्ष्यते |  ५   क
मत्सकाशं जीवितार्थी तस्य त्यागो विगर्हितः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति