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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
यत्रैष शव्दस्तुमुलः पर्जन्यनिनदोपमः |  ५   क
तत्र गच्छ द्रुतं राजंस्ततो द्रक्ष्यसि कौरवम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति